लोकबा बेमार अछि

29 दिन पहिले प्रकाशित
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प्रेमविदेह ललन
प्रजातन्त्र सेनानी आ पूर्व सांसद महेन्द्रकुमार मिश्र स्थापित साहित्यकार सेहो छथि । नेपाली, मैथिली , हिन्दी आ उर्दू भाषामे कलम चलौनिहार मिश्रजीक उदय मैथिली साहित्याकाशमे वि.सं.२०६० के दशकमे भेल छनि । कविता, गीत, गजल, जीवनी, विभिन्न विषय पर लेख लीखैत रहैत छथि ।
बहुविधाक लेखक मिश्र मैथिलीभाषामे नवकृति ‘लोकबा बेमार अछि’ (नाटक ) प्रकाशनमे अनलाह अछि । ३४ पृष्ठक एहि नाटकपोथीक अगिला कभरपर एकटा बीमार व्यक्ति आ आन्दोलनकचित्र अछि । पछिला पृष्ठ पर लेखकक परिचय छपल अछि । वि.स.२०८१ मे प्रकाशित एहिपोथीक प्रकाशन महोत्तरी जिलाक लोहारपट्टी नगरपालिका कएने अछि । मैथिली साहित्यमे सभसँ बेसी कविता लिखाइत युगमे महेन्द्र मिश्रक नाट्य कृतिक प्रकाशन प्रशंसनीय अछि ।
एहि नाटकमे १४ गोट पात्र देखल जाइछ सुगिया, चुल्हाइ, दुखना, मरनी, मितना, मुसाइ, टिमकियाबाली , व्यापारी, नेता, ठिकदार, पुलिस, कर्मचारी, पागल आ लोकबा ! लोकबा प्रधानपात्र अछि लोकतन्त्रक पर्याय , लोकतन्त्रक प्रतीक ।
सुगिया आ चुल्हाइक बालकक भूमिकामे लोकबा रहल अछि । अन्यपात्रक रूपमे युवक, पी.ए., गणपति लाल, धामी, भद्रपुरुष अछि । पार्श्वमे मन्त्रीपात्र सेहो अभरल अछि । पात्र अनुसारक भूमिका आ संवादक सन्तुलन भेल छै ।
एहि नाटकमे कल्पणाक स्थान नहि अछि ; यथार्थवादी नाटक अछि । देश , मधेश आ समाजक वास्तविकताके पर्दाफास कएलगेल अछि । नाटक गीतेसँ आरम्भ होइछ आ गीतेसँ समाप्त होइत अछि । छओ दृश्यक नाटक अछि । पहिल दृश्यमे जनआन्दोलनक झलक देखाओल गेल अछि । दोसर दृश्यमे सुगियाक प्रसव पीड़ा आ लोकबाक जन्म ।
लोकबा नामक सांकेतिक पात्रक माध्यमसँ लोकतन्त्रक प्रादुर्भावक चर्चा कएल गेल अछि । सुगियाक प्रसव पीड़ाके २०६२ सालक जनआन्दोलनक पीड़ासँ जोड़ल गेल अछि । सुगियाक पुत्र लोकबाक जन्म माने लोकतन्त्रक आगमन अछि । लोकबाक माय–बापक माध्यमसँ दूटा बालक पहिने भेल आ मारल गेल बताओल गेल अछि ।
माने २००७ साल आ २०४६ सालक प्रजातन्त्रक हरणदिसक संकेत छै । जनताक लड़ाइसँ प्राप्त लोकतन्त्रक अवमूल्यन भेल , शहीदक अपमान भेल आलोकक सपना टूटल विषयक चित्रण अछि ।
देशमे नेतासभ लूटतन्त्र मचौने अछि । भ्रष्टाचार, दण्डहिनता, महगी, बेरोजगारी, गरीबीसन, बीमारी व्याप्त अछि । तएँ लोकतन्त्र बीमार अछि । उपचार आवश्यक अछि । एहे नाटकक मूलभाव अछि । लोकतन्त्रक रक्षा एहि नाटकक सन्देश अछि ।
तएँ किसान, मजदूर, गरीबक समस्याक निदान जरुरी अछि । सङहि दहेज, अन्धविश्वास, अपहरण, फिरौतीसन सामाजिक बिकृतिसभक अन्त सेहो समाजक विकासलेल आवश्यक अछि । नाटकक माध्यमसँ लेखक मिश्रद्वारा सुझाओल गेल अछि ।
जतएधरि नाटकक निर्बल पक्षक गप अछि से थोड़थाड़ देखल गेल अछि जे निम्नानुसार अछि :
१. शीर्षक सटीक नहि अछि । लोकबा शब्द भोजपुरिआएल अछि । सर्वसाधारणक संवादमे ‘अछि’ शब्दक प्रयोग नहि होइछ । तएँ एकर शीर्षक ‘लोकतन्तर’ वा ‘बेमार बेटा’ रहैत तँ बेस !
२. एही नाटकके लघुनाटक कहल गेल छै । वस्तुत : ई एकाङ्की नाटक अछि । एके पक्षपर ‘फोकस’ कएल गेल अछि । कथावस्तु लोकतन्त्रक परिधिमे घूमैत अछि ।
३. शब्द आ वाक्यक अशुद्धि बहुतो ठाम भेल अछि । यथा सब के एक भरस’ गगोली छैक लागगल । दशौं आँगुर घीउमे भावकभारी जनता पर । …….ईमहशुशकरादेली जे ………….।
४. कतौ कतौ कथ्य भाषामे लेख्य भाषाक शब्द प्रयोग भेल अछि । जेना पड़तैक, अछि , छैक , नहि ……….।
५. प्राचीन नाटकक पात्र सूत्रधार जका प्रारम्भमे मन्तव्य राखल गेल, से अखुनका परिवेशमे उपयुक्त नहि ।
६. आजुक नाटकमे अपवाद छोडि़ गीतक प्रयोग नहि होइछ । एहिमे चारिटा गीत छै । गीत सान्दर्भिक छै । तीनटा गीतमे मुखड़ा, अन्तरा आ लयक सन्तुलन नहि छै । एकटा गीतमे सन्तुलन छै केकरा सुनाउ दुख (धनिया हो खटर काका …..!
७. प्रत्येक कृतिक सुरक्षाक लेल आइएसबीएन जरुरी होइछ । से सूचीकृत नहि कराओल गेल अछि ।
निष्कर्षमे ई कहल जा सकैछ ई एकाङ्की मैथिली नाट्यसाहित्यक मूल्यवान कृति छै । एकर मञ्चन कएल जा सकैए । दर्शकके मनोरञ्जन आ लोकतन्त्रक रक्षालेल उत्प्रेरणा समेत जगाओत ओ हमरा विश्वास अछि ।