हिमवत्-खण्ड भारतवर्षमे नागपुजन परम्परा एवं नागवंश

२०७८ श्रावण २९, शुक्रबार १२:५७
सीमाञ्चल समदिया

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शब्द/चित्रः–उपेन्द्रभगत नागवंशी

नाग पुजा वर्तमान समयधैर प्रायः देश समाजमे होइत छै । सनातन धर्म मानबाला समुदायमे विशेष रुपस’ नागपुजा करब परम्परा विकशित छै । अइ नाग–साँपक महत्व मानव जीवन आ मानवीय सभ्यतास’ जुड़ैत आएल बोध स्वतः होइत छै । मुदा एकर पुजक आ पुजन परम्परा विकशितकर्ताक सम्बन्धमे लोककण्डस’ लीखितम् साहित्यमे होइतो अइवंशक लोककेँ आइयो देशमे कतहु गणना नइ कएल जारहल छै । जखन की अतिप्राचीनकालस’ नाककूल–मूलके लोकक चर्चा विभन्न साहित्यमे होइत आएल छै ।

विभिन्न काल–खण्डमे संसारक आधास’बेसी क्षेत्रमे अपन आधिपत्य जमौने नागवंशक लोक खाशक नेपालमे आँगूरमे गण्ना करब जोकर संख्यामे रहिगेल छै । तथापि देशक भाग्य निर्माता राजनीतिक दल आ सत्ता सरकारमे सामेल लोक नेपालक पहिल जाति–समुदाय नागवंशक लोक–‘नागवंशी’केँ लोकतन्त्रोमे राज्यक मूलधारस’ अछोप रखने आएल छै ।

नागवंशके उत्पति
वेद–पुराणक आधार पर नागकूलक लोक ‘नागवंशी’ समुदायक उत्पति, पराकर्म आदिक वारेमे ओझराहटसभ सेहो देखल जाइत छै । तकर कारण छै अइसभ पर सूक्षम दृष्टिए अध्ययन अनुसंधान कएले नइ गेलै ।

हिमवत्-खण्ड नेपालमे अल्पसंख्यक आदिवासी नागवंशी समुदायकेँ सम्बन्धमे आइधैर कोनो सुच्चा पुस्तक तयार नइ छै । किछु वंशावली आ कतहु कतहु प्रसंगवश चर्चा अएला पर अइ कूलवंशक अस्तित्व विगत आ वर्तमानधैर रहल साक्ष्य भेटैत छै । तेहनावस्थामे खोजी करब आओर लीपिबद्धता दुरुहकाज छै ।

नागवंश÷नागवंशी समुदायक उत्पति तत्कालिन भारतवर्ष अन्तर्गत हिमालय कोइखमे भेल छै । पृथ्वी पर अलौकिक रुपमे नागवंश प्रकट भेल तथ्य भेटैत छै । नागवंशी कोन वंश–कूलक छै, कत’ स’ आएल, कोना आएल !

एकर इतिहास विकास खोजी कएला पर वैदिक, पौराणिक, ऐतिहासिक शास्त्रीय एवं लोककथा, वेद–पुराण, रामायण आ महाभारतसन महिमामण्डित ग्रन्थसभस’ ल’क’ जैन आ बुद्धकालिन साहित्यमे समेत नागवंशक उत्पति स्थान विस्तार, कूल–वंश, परम्परा एवं पराक्रमक लेखा–जोखा भेटैत छै ।

देव, दैत्य, दानव, मानव, किन्नर, बानर, राक्षस, पिसाच, यक्ष, सिध्म, मरुदगण, चारण, भांट, विद्याधर, गन्धर्व, अप्सरा, किराँत,  नागवंश ! आदिकालमे वस उल्लेखित एतबए जाति–कूल छल । हिमालय पर्वतक लगपासमे ई सभ रहैत बसैत आएल छल । जाहिमे नागवंशी अलौकिक रुपमे प्रकट भेल जाति–समुदाय मानल गेल छै ।

उत्पतिकथा– वैदिककालमे महाऋषिक दर्जा प्राप्त कश्यप मुनीके तेरहटा श्रीमति छल । जाहि मादे ‘‘कद्रू आ विनता’’के सम्बन्ध नागवंशस’ छै । प्राचीनकालमे नागकूलक लोकक उत्पति हिनके महिमा गरिमास’ भेल इतिहासमे उल्लेख पाओल जाइत छै ।

महाऋषिक कश्यपकेँ घरनी÷श्रीमति ‘कद्रू’ आ ‘विनता’ स’ जन्मल सन्तान दू खेमामे बंटाएल जाहिमे एकटा नागवंशी भेल ।  कश्यप आ कद्रूक देहस’ बहराएल आठटा सन्तान आगा जाक नागवंशी कहाएल । नागवंशक कूल, वंश कायम भेल । नागवंशक परम्परा बनल आ हिमवत्-खण्ड भारतवर्षक दूतिहाईक्षेत्रमे अपन शासन सत्ता सञ्चालन कएलक ।

कश्यप आ कद्रूक आठ पुत्र क्रमशः (१) अनन्त, (२) बासुकी, (३) तक्षक, (४) काक्र्रोटक, (५) पद्म,(६) महापद्म, (७) शंख, (८) कुलिक भेल । हिनकासभक कश्यपवंशी सेहो कहल जाइत छल । मुदा जहिना ईसभ अपन–अपन क्षेत्रमे राजपाट सम्हार लगलाह तखन सभ अपनाकेँ नागवंशी कहाए लागल । तकर ओजह छल कश्यप–कद्रू पुत्र सभ नाग–साँप सन विषधर जन्तुक पुजक अधिक छलाह ।

हिमवत्-खण्ड भारतवर्षमे नागवंशक एहे आठकूल रहल बसल ! अपन समुदाय–पारिवारक बिस्तार करैत गेल । जहिना–जहिना समुदायक बिस्तार भेल तहिना–तहिना स्थान अनुसार नाम आदिक बिस्तार समेत भेल । उल्लेखित आठकूल एकस्थानस’ दोसर स्थान पर जाक’ रहल बसल नागवंश अपन समुदायक बिस्तार क्रममे ‘नल’, ‘कवर्धा’, ‘फनिनाग’, ‘भोगिन’, ‘सदाचन्द्र’, ‘धनधर्मा’, ‘भूतनन्दी–यशनन्दी’, ‘तनक’, ‘तश्त’, ‘ऐरावत’, ‘धृतराष्ट्र’, ‘अहि’, ‘मणिभद्र’, ‘अलापत्र’, ‘कम्बल’, ‘अंशतर’, ‘धनन्जय’, ‘कालिया’, ‘सौंपू’, ‘दौध्दिया’, ‘काली’, ‘तखतू’, ‘धूमल’, ‘फाहल’, ‘काना’, ‘गुलिका’, ‘सरकोटा’ आदि रुपमे नागकूल–वंश प्रसिद्ध भेल चर्चा वेद–पुराणमे वर्णित छै ।

कश्यप मुनिक ‘विनता’ नामक रानीस’ मात्र दूटा सन्तान भेल ओ विषधारी साँप–बिच्छ आ गरुड़ सन जन्तुक रुपमे बिस्तार भेल । तैँ नाग आ साँपके भिन्नता मान्यजन आइयो नीकस’ नइ बुझि सकल छै, नइ धर्मक नाम पर ठेकेदारी चलौनिहार आ अपन दबदबा कायम रखने पण्डा–पुरोहित आदि धर्मभिरुसभ समाजके बुझाब सकल । विज्ञानक युगमे भ्रमजालस’ उबार नइ सकल छै ।

आस्था विश्वास धर्मप्रति एहन बनिगेल छै जे लोक सहजे बुझ–सुझ लेल तयारो नइ होइत छै । नागवंशके साँपस’ तुलना कदेल गेल छै आ आइयो कएले जाइत छै । एहिमे अनन्त(शेष) नाग, बासुकी नाग, तक्षक नाग, कालिया नाग, नागवंश अधिक पराक्रमी आ षडयन्त्रकेँ पर्दाफासकर्ता छलाह । हिनक सबहक झांपल–तोपल रुपमे अस्तित्व स्वीकारल गेल । मुदा जन्तु सरह मानिक कतिया देब ओहन षडयन्त्री काज कालान्तरधैर होइत रहल । तकर परिणति छै नागवंशक मानव समुदाय आ जन्तु साँपक भिन्ता बुझबमे भंगठाइत रहल तत्कालिक आ वर्तमान समाज सेहो ।

एकस्थानस’ दोसर स्थान गेला पर ओकर इतिहास खोजला पर ई बातसभ फरिछाइत छै । चाहे ओ वेद–पुराण कालक गप्प होए अथवा रामायण महाभारत, बौद्ध,जैन अथवा तकराबादकेँ जे कालखण्डक इतिहास होए नागवंशक सार्थकताक चर्चा अरबैसक पाओल जाइत छै ।

बर्तमान समयमे जतह जतेक संख्यामे आदिवासी नागवंशी समुदाय छै, हुनक सबहक मूल–जाति आइयो आठटा प्रमुख रुपमे छै । जकर नाम फरक–फरक सुनल जाइत छै । उण्संघीय कतान्त्रिक गणतन्त्रात्मक शासनव्यवस्थामे नागवंशी समुदायक कतहु कोनो सहभागिताक चर्चो वर्तमानमे नइ कएल जाइत छै, तखन समावेसिताक बात आओर के करत !

नेपालके राजधानी काठमाण्डौ उपत्यका मानव वास योग्य भेला पर गाय आ भैसीं चराबबाला किछु गोटेक समूह प्रवेश कएलक । ओइस’ पहिने जलमग्न अवस्थामे रहल काठमाण्डौ उपत्यकामे नागवंशी समुदायक लोकक बास स्थान छल । मञ्जुश्री चोभार स्थित पहारके काइटक पानी निकाय कएलाबादधैर नागवंशीसभक प्रभुत्व कायमे छल ।

गोपालवंश,महिंसपालवंशकेँ प्रवेश पछाइत नागवंशक लोकसंग मुठभेड़ भेल । जाहिमे नागवंशीसब देशक विभिन्न कोन्हमे पसैरत पतराइत हेराइत गेल बहुतो दोसर वर्ग समुदायमे मिझराक रहिगेल । एकर सवतन्त्र अस्तित्वपर संकट आवि गेल । एहन आश्य व्यक्त सोमप्रसाद खतिबडा लीखित ‘ नेपालको पुस्तकमे व्यक्त कएने छैथ । जे पुस्तक प्लस टूमे भाषा–साहित्य आ संस्कृति विषय ल’क’ पढबालाकेँ पढाओल जाइत छै । उपत्यकामे किर्तीपुर स्थित टौदहक्षेत्र नागवंशी सबहक मूलस्थान छल ।

नाग एवं नागकूल
महाभारतक आदिपर्वमे वर्णन कएलगेल कथानुसार ‘कद्रू’ आ ‘विनता’ दक्ष प्रजापतिक पुत्री छलीह । महर्षि कश्यपके तेरहटा पत्नी छल । जाहि मादे ‘कद्रू’ सेहो छलीह । कद्रू बडबेसी कश्यपमुनीकेँ सेवा कएलीह । पत्नीसेवास’ प्रसन्न कश्यपमुनी एकदिन कद्रूस’ अपन इच्छा अनुकूल वरदान मांग लेल कहलाह ।

‘‘ एकहजार तेजस्वी नाग हमर पुत्र होए, हम्मर ओ नागपुत्र केहनो स्थानमे विराजमान हुअ सकए,’’ एहन वरदान मांग कएलीह…! कश्यपमुनी कद्रूके इच्छित वरदान देलाह । फलस्वरुप नागवंशक उत्पति भेल । बिनताके कोखिस’ दूटा सन्तान भेल । जाहिमे साँप–बिच्छ, गरुड़ जन्मल ।

एकसमयमे कद्रू आ विनताबीच व्यमनस्ता उत्पन्न भेल आ नाग–साँप भाय भायबीच खटपट भगेल । कश्यपमुनी जाहि पर्वतीयमाला पर रहैत छलाह ओतह एकटा सुन्दर उज्जरका घोड़ा भागल जारहल छल । ओ घोड़ाके दिश कद्रू आ बिनिता दूनु आकर्षित भेल । कद्रू कहली– ‘‘घोड़ा बड सुन्दर आ देखनहुत छै मुदा, एकर नाङ्गरि कारी छै ।’’ तैपर विनता बजलीह–‘‘नइ ! घोड़ाके देह जकाँ नाङ्गरि सेहो उज्जर दपदप छै । ’’ अइबात पर दूनुके हरबाजीद लागिगेल ।

एहेबात दूनुबीच व्यमनस्यक कारणो बनल । घोडाक नाङ्गरि कारी छै उज्जेर छै एहि विषय पर गन्थन–मन्थन कद्रू आ विनतामे होइत हबाइत हरबाजिद लागिगेल घोड़ाके लगमे जाक देखल जाए । लगमे जाएस’ पहिने कद्रू अपन नागपुत्रसभस’ कहलक अपन–अपन आकार छोट क’क’ गौंस’ चुप्पचाप घोड़ाक नाङ्गरिमे जाक’ लेपटा जाउ । जाहिस’ उज्जर नाङ्गरि कारिया देखाए ।

नागपुत्र नइ मानलक तखन कद्रू अपन माताक बात नइ मानबालासभ यज्ञमे भष्म भजाएब ओ श्राप दिअ लागल । विनता पुत्रसभ सेहो श्रापस्वर सुनलक । श्रापक डरस’ ओसभ जाक’ घोड़ाक नाङ्गरिमे एनाक लपटागेल जेना नाङ्गरिए होए । जाइत भगैत घोड़ाकेँ नाङ्गरि देखला पर करिया देखाएल । कद्रू अपन चालाकीक कारण शर्त–बाजी जीत गेल ।

शर्त मुताविक विनताकेँ कद्रूक दासी बनिक रह’ पड़लै । अइ बातक जनतब जखन विनता पुत्र पंक्षीराज गरुड़केँ भेटल तखन ओहो आक्रोषित भेल । आक्रोषमे अपन कतेको साँपभायकेँ गिरगेल । शान्त भेलापर शेष जे बाँचल तिनकासभस’ विनति करैत उसासक उपाय पुछलक । अपन मायकेँ दासतास’ मुक्तिलेल कि कएल जाय ? कद्रूपुत्र नागसभ कहलक स्वर्गस’ अमृत लाविक दिअ कहलक ।

गरुड़ स्वर्गस’ अपन पराकर्म बलस’ अमृत कलश ल’ आनलक । एकप्रकारक आराघास–‘कुशा–कुश’ पर अमृत भरल कलश गरुड़ राखि देलक । अमृतपान करबस’ पहिने देहशुद्धि लेल नाग–साँप स्नानादि हेतु अमृत राखल स्थानस’ गेल । ताबतमे स्वर्गक देवराज ईन्द्र आएल आ अमृतकलश उठाक पुनः स्वर्गलोक लगेलाह ।

देहशुद्धि क’क’ आएल नाग–साँपसभ अइबातक जनतब भेला पर दुखित भेल । हारिपाछिक अमृत कलश राखल स्थलमे किछु ठोप अमृत बून्न त’ अवश्य खसल होएत ओ अभिप्राय आ विश्वासस’ आराघासकेँ चाटय लागल । ओहो अमृत चाटब क्रममे आराघासस’ नाग–साँप सबहक जीह कटा–कटाक दू फाँक भगेल । तहियास’ साँपकेँ जीह दू खण्डरुपमे देखाए लागल ।

जिनका अमृतक लसेर मूँहमे गेल ओ नाग मणिधारी, विषकारी, प्राणघातक आ प्राणदायी भेल । जिनका मूँहमे अमृतक कनेको लसेर नइ गेल ओ जन्तु विषहिन साँप रहल ।

जेना ‘अजगर’, ‘धामन’, ‘एनाकोण्डा’,‘सांकट’,‘हरहरा’,‘ढोडि़या’,‘मच्छगिद्धी’,‘मटिया–दूमूहा’,अन्हरा–तेलिया, कलमूँहा, सृंगारिक, ‘अन्है’ आदि विषरहित सर्पजीव होइत छै । अइ साँपस’ सेहो लोक डेराइए त’ मुदा पुजाइत नइ छै । पुजा त’ विषधरराज नाग आ ओइकूलक अन्य नाग–नगिनियाके होइत छै ।

जेना–‘‘विभिन्न तरहक नागराज, नागरानी, काल्यानाग, राजगहुँमन, गहुँमन, कथगहुँमन, हरिगहुँमन, करियागहुँमन, पनियादरार, गनगुआइर, सुगबा,बघबा,बिलड़ा, करैत, घोड़करैत, बहिरीकरैत,आदि ।

ई खेरहासभ देखला पछाइत शेषनाग सभकेँ छोडि़क कठिन तपस्या हेतु बहरागेल । हुनक तपस्यास’ प्रसन्न भ’क’ ब्रह्माजी वरदान देलाह । तकराबाद ब्रह्माक कहला पर शेषनाग पृथ्वीक भितर गेल । अपन आश्रय बनौलक । नागराज बासुकीके जखन पत्ता चलल, ओहो चिन्तित भेलाह । एलापत्र नाग ‘‘सर्पयज्ञमे दुष्ट साँपसभकेँ नाश होएत । जरत्कारु नामक ऋषिक पुत्र ‘आस्तिक’ यज्ञ पुरा हुअस’ रोक सकैए । साँपक बहिन ‘मनसादेवी’क वियाह ‘जरत्कारु’ ऋषिस’ होएत ।’’

एहन सन्देश नागराज बासुकीके देलक । जाहिस’ बासुकीके सन्तोष भेल । समय बितला पर बासुकी अपन बहिनकेँ वियाह जरत्कारुस’ करबा देलक । बादमे मनसादेवीक पुत्र भेल । जिनकर नाम आस्तिक राखल गेल । बालक आस्तिक नागराज बासुकीकेँ घर पर पलाएल पोशाएल ।

च्यवनऋषि आस्तिकके बाल्यवस्थास’ वेदसभकेँ ज्ञाण देने छलाह । ओइ समयमे पृथ्वी पर राजा जनमेजयक शासन व्यवस्था कायम भगेल छल । जनमेजयकेँ जखन जनतब भेटल ‘हुनक पिताके तक्षकके कटला पर मृत्यु भेल छल ।’ तखन ओ क्रोधित भए उठलाह आ अपन पिताके हत्याराकेँ समूल नाश करब हेतु अभियान चलौलाह । ‘नागदाह–सर्पदहन’ यज्ञ आयोजन कएलाह । नागदाह दमनमे       ऋषि–मुनी नाम ल’ल’क आहुति दैत छल ।

जाहिमे बड़का–छोटका, बृद्ध–युवा सभतरक साँप सभ आवि आविक मूक्षित भ’ खसैत मरैत जारहल छल । अइस’ डेराक तक्षक देवराज इन्द्र लगमे जाक शरण लेलक आ अपन कूलकेँ बचाब लेल सहायता मांगलक । तकराबाद आस्तिक मुनी यज्ञस्थल पर गेला आ जनमेजयकेँ यज्ञ रोकल जाय लेल निवेदन कएलक ।

जनमेजयके सम्झौला बुझौला पर ओ मानि गेलाह आ यज्ञ आहुति काज रोकलाह । आहि यज्ञमे धर्मात्मा साँपसभ भस्म हुअस’ बाँचि गेल आ पपियाहासभकेँ नाश भचुकल छल । आइयोके समयमे आस्तिक मुनीकेँ नाम ल’क’ स्तुति कएला पर विषदोष नइ लगैत छै । लोक सर्फदंशस’ बचैत छै । एहन धार्मिक लोकमान्यता विद्यमान छै । तैँ हरेक सुमुदाय नाग–साँपकेँ आओर नइ त’ वर्षमे एक दिन अरबैसक विशेष रुपस’ पुजा आराधना करैत छै । ई पुजनकरब परम्परा शुरु भेल समयस’ वर्तमानधैर करैत आएल छै ।

सनातनधर्मीहमसभ श्रावण महिनाकेँ पञ्चमी तिथिक नागपुजा करैत छी । नागपुजाकेँ बादे आन पुजा–उत्सव आरम्भ होइत छै । अइ बेर नागपुजनोत्सव साओन-२९गते शुक्रदिन पड़ल छै । गतवर्ष ई पर्व  शनिदिन१०गते पड़ल छल । नागवंशी समाज मिथिला नगरि जनकपुरधाममे हर्षोल्लाससंग नागपुजन करैत आएल छै । नागदेवताके प्रतिमा स्थापित कए मेला आयोजन करैत आएल छै । अइबेर जानकीचौक संगेसंग,अपन जातिय मठ जीरोमाइल लग विशेष रुपस’ सेहो नागवंशी चौरसिया समाज नागपुजन आयोजन कएने छै ।

राज्यसिनेहस’ बञ्चित नागवंशी समुदाय
‘‘नागवंशक जातिसभ कश्यप ऋषिक सन्तान छै । नाग आ साँपकेँ कतहु एक नइ मानल जासकैए । नाग आ साँपमे भेद छै ! भिन्नता छै !! अइ तथ्यकेँ बिनु बुझने ‘नागवंश’ एकर मूल–कूल परम्परा एवं समुदायकेँ नइ बुझल जासकैए । सनातनधर्म वेद एवं पुराण एहि दूटा पद्धतिपर केन्द्रित छै । पुजा–प्रार्थणा सेहो एहि पर कायम छै ।

नागपुजन परम्परा पुराणपर आधारित पुजा छै । बादमे लोकधर्म बनिगेलापर लोकआस्थाक परम्परागत पुजन प्रथा विकसित भेल । पहिने मूलतः शैव, शाक्त, नाथ, एवं नागपंथमे मात्र नागपुजा करब ओ परम्परा कायम छल । आब हरेक सनातनी धर्म–सम्प्रदायक लोक पुजा,प्रार्थना करैत छै ।

नागवंशीसबहक कथा, प्रचलन प्राचीनकालस’ विकसित आ विराटरुपमे अस्तित्वमे रहैत आएल छै । तैँ आइयो नागपुजा, नागदेवता, नागकन्या, नागमणि,नागलोक, नागरानी, नागराज, नागकथा, नागउत्सव, नागनृत्य, नागनाटक, नागमन्त्र, नागव्रत आ नगवंशक चर्चा हरेक कालखण्डमे होइत आएल छै । जेना सूर्यवंशी, चन्द्रवंशी, अग्निवंशी, यदुवंशी, राजवंशी आदि छै, तहिना अइसभस’ उपर नागवंशीक प्राचीन इतिहास छै । गौरव करब जोगर परम्परा छै ।

धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक इतिहास छै । मुदा धार्मिक, सामाजिक आ सांस्कृतिक इतिहासकेँ सर्वसम्मत बनाक क्रमबद्ध रुपमे नइ लीखल गेलास’ बिरोधाभाष दृष्टिगोचर होइत छै ! इतिहास रचियता प्रायः सभ सत्ताधारक केन्द्रमे राखिक कलम चलाबैत रहलाह । अपन विद्वताकेँ सत्ताधारक टहलु जकाँ अपनाकेँ बनाक कलम ससारैत रहलाह ।

ओहिस’ प्राथमिक्तामे एहि समुदायक वर्णन नइ भेल । नागवंशक कारनामाकेँ अक्षरशः इतिहासिक दस्तावेजमे सोकजगर रुपम ओ सभ नइ प्रस्तुत क’ सकलाह । एहन बात विशेषतः नेपालमे बेसी भेल देखाएल छै ।

अन्यथा नेपालक नामाकरणस’ पहिनहीस’ जे समुदाय रहैत–बसैत आएल छल, नागवंशक विकसित सभ्यता आ समाज छल तकर चर्चा प्राथमिकतासंग नेपालक इतिहासमे नइ होइक ! काठमाण्डौ उपत्यका आइयो एकर साक्षी छै । क्रर्कोटक, बासुकी आदि नागवंशक वासस्थली छल । नेमिमुनी जिनका नामपर नेपाल देशक नामाकरण भेल छै । ओ नेमिमुनी नागवंशक प्रधान पुरुख छलाह ।

वेद–पुराणक गप्प छोडि़देल जाए, त’ आर्यसबहक (खश–आर्य)के प्रवेश नेपालक पछिममे कर्णालीक्षेत्रमे (तहियाके भोंट प्रदेशमे) भेल छल । आजुक समयमे खश–आर्य सउंसे देशमे कोनो ने कोनो रुपमे अपन पक्कर बनाक रखने छै ।

अघोषित रुपमे एकप्रकारस’ सभकेँ उपर राज करैत आविरहल छै । भारतवर्षक हिमवत्–खण्ड नेपालमे खशआर्य प्रवेश कएलापर ओहि कालखण्डमे भोटप्रदेशक राजा आर्य–खशकेँ शरण देने छल ओ नागवंशी छलाह ।

अहि बातके प्रमाण राजाराम सुवेदी रचित ‘कर्णाली प्रदेशक इतिहास’मे भेटैत छै । तथापि नेपाली शासक पृथ्वीनारायण शाहस’ ल’क’ (राणा, राजा,पञ्चायत व्यवस्थास’ बहुदलीय प्रजातान्त्रिक व्यवस्थाधैर आ अखुनका संघीय लोकतान्त्रिक गणतन्त्रात्मक राज्यव्यवस्थामे सेहो नागवंशी समुदायक कतहु कोनो लेखाजोखा नइ कएलगेल छै ।

नागकूलक नागवंशी समुदाय अन्तर्गतकेँ जातिसभक नइ आदिवासी जनजातिमे, नइ दलित जनजातिमे, नइ पिछड़ल वर्गमे आ नइ अल्पसंख्यक समुदायमे सूचीकृत कएने छै । एहन विभेदक सिकारमे राज्यपक्षस’ नागवंशी समुदायकेँ पारलगेल छै । जखन की ‘अल्पसंख्यक आदिवासी समुदाय’ अन्तर्गत नागवंशी जाति–समुदायकेँ सूचीकृत कएल जाय चाही ।

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