दुषित सामाजिक जीवनके उपचार ‘रक्षा-बन्धन’

२०७९ श्रावण २७, शुक्रबार १७:३०
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उपेन्द्र भगत नागवंशी,जनकपुरधाम । भातृत्वप्रेमके प्रतिक ‘रक्षा बन्धन’ अइबेर दू दिन पड़ल छै । प्रकृतिके विधान अनुसार राषिचक्र अपन समयानुकूल अन्तरीक्षमे घूमैत रहैत छै । ओहि हिसाबस’ समय परिवर्तती होइत छै, पृथ्वी पर दिन आ रातिके रुपमे समय अबैत-जाइत छै ।

 

साओन पूर्णिमा दिन मिथिला समाजमे भाय-बहिनबीचके सिनेह डोरी बान्हब विधिके ‘रक्षा बन्धन’ ‘राखी बन्हाई’ पर्व कहल जाइत छै । नेपालके पहाड़ी समाजमे जनौ पूर्णिमाके रुपमे रक्षा बन्हन मनाओल जाइत छै । अइ दिनमे जनेउधारीसभ पुरनका जनौ हटाक नवका जनेउ धारन करैत छैथ । हातमे एकप्रकारके रक्षासूत सेहो पुरोहित मादे मन्त्रोच्चारण सहित बन्हबाबैत छै ।

 

मिथिलाके नारी, अपन भैया-भायके हातमे रक्षा सूत(राखी) बान्हिक मिष्ठान खुवाक दीर्घजीवनक आशिष दैत छै । ओहिके बदलेनमे नारी अस्मिताके रक्षाक भार बहनकारक वचन भायसभसंग लैत छैथ । संगेसंग अर्थ-मुद्रा दान दक्षिणाके रुपमे सेहो बहिन दीदीसभ भाय हातस’ बकशिष स्वरुप प्राप्त करैत छैथ ।

 

एहि लोकपर्वके हरेक समाजमे मनाबके अपन बिधान छै । तथापि मूलध्यये नारी अस्मिताके रक्षा एवं पुरुष(भाय)केँ दीर्घजीवी भवःके आशिर्वाद देब मुख्य चलन प्रायः समाजमे विद्यमान छै ।

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जनकपुरधाम वार्ड नं.४मे एकटा परिवारमे अप्पन भैयाके हातमे राखी बान्हत बहिन ।

 

रक्षाबन्धनके शुरुवात अति प्राचीनकालस’ होइत आएल छै । देल वचनकँे मनस’ बान्हब एवं ओहिवचनके निर्वाहण हेतु जान-पराण लगाक पुरा करब ओ अभिप्रायः मूलरुपस’ रक्षाबन्धन लोकपर्वमे सम्माहित छै ।

 

आइस’ छओ/सात हजार वर्ष पहिने त्रेतायुगमे माता सीता एवं भगवान रामके अनुयायी ‘हनुमान’ सिनेह बन्हनमे बन्हाक रामसंग वचन बन्हन पुरा कएने छलाह । जीवन अवधिमे अनेक उतार चढ़ाव मानवके देख, भोग पड़ैत छै ।

 

जाहिमे कर्म निष्ठापूर्वक करए पड़ैत छै । ककरो देल वचन, कहल बातके पूर्ण करहिटा पड़ैत छै तखने प्राणि सुयश प्रापक होइत छै । समाजमे मान भेटैत छै, प्रतिष्ठा जोगल रहैत छै । रक्षासूत बान्हब ओकरा निमाहबके ततापर्य ओहे छै । जे प्रतिकात्मक रुपमे रक्षा बन्हनके दिन हमसभ मनाबैत छी, लोकपर्व रुपमे !

 

रक्षाबन्धन वा राखी बान्हब प्रचलन

आब रक्षाबन्धन वा राखी बान्हब प्रचलन भाय बहिनबीचके लोकपर्व सम्बन्ध कोना जुड़ल एकर इतिहास खंगारला पर तत्कालीन भारतमे मुगल शासनकालस’ एकर रोचक इतिहास जुड़ैत छै ।

 

सन् १५२६ ईश्वीमे भारतमे मुगल राज्य कायम भेला पर हिन्दु नारीसभके उपर खतरा अधिक मडराए लागल । महिलाके इज्जत अस्मत जोगाबमे जोगाक राबमे अनेक बाधा-अड़चनसब आब लागल । तेकर काट, उपायके युक्तिसभ सेहो खोजी होइत गेल, ताहि समयमे कएलगेल युक्ति सोकजगर भेल । ओहे युक्ति एकटा स्वरुप रक्षाबन्धनके रुपमे कालान्तरमे आइबक सार्थकता शिद्ध कएलक ।

 

मध्य एशियामे फरगनाके राकुमार जाहीरुद्दीन बावर मुगल राज्य स्थापना कएलाह । इतिहासमे दर्ज पानीपतके युद्धमे दिल्लीके सुल्तान इब्राहिम लोदीके पराजित क’क’ मुगलशासक शासनमे अएलाह ।

 

अनेक युद्ध संघर्ष पछाइत १५५६ ईश्वीमे मुगल शासन पूणर्ता पौलक आ स्थायीत्व प्राप्त कएलक । तेकराबाद कुरुता बर्बताके अनेक पेहानी मुगल शासन अवधिमे भेटैत छै । विशेषतः नारीके अस्तित्वसंग खेलवार करब, ओकर अस्तित्वके नइ स्वीकारब !

 

नारीकेँ भोग लिप्साके साधन मात्र बुझब ओ काज होइत रहल । राजा हुनक सामन्त एवं राजकाजमे लागल साधारण कामदारसभ सेहो राजा एवं सामन्तक आदेशके नाम पर पसिनगर नारीके फूसलाक, लोभाक नइ मानला पर उठाक लजाइत छल । दरवारमे दासी, नर्तकी, रखैल-फतुरीया बनाक राखल जाइत छल ।

 

अकबर नेतृत्वके मुगल शासनकालमे अनन्तपुरःके कथा बिख्यात छै । ओहि समयमे अनन्तपुरःमे ५ हजार नारीके विभिन्नक्षेत्रस’ लाइबक राखल जाइत छल । विभिन्नक्षेस’ आनल सुन्दरी महिलासभके मुगलशासक विश्वास पात्र महिला अधिकारीके रेखदेखमे रहैत छल ।

 

सुनरकी महिलासभकेँ उचित खानपान सैय्याहार ब्यवहारसंग तैयार क’क’ भोग-बिलास हेतु राखल जाइत छल । जेकर पृथक-पृथक मण्डल होइत छल । बादशाह, राजा, सामन्त एवं आगुन्तुक सभलेल अलगे-अलगे समूहमे बिलाशिता हेतु नारी-दासीसभकेँ राखल जाइत छल । सामाजिक जीवन अत्यन्त दुषित छल, स्वाभिमानस’ जीवबाला दुखित रहैत छल ।

 

दुषित सामाजिक जीवनके उपचार

अभाव, अयोग्यता, ईष्या-व्देष, वैमनस्य एवं षडयन्त्रस’ सामाजिक जीवन दुषित बनल छल । सभकेँ नइ चाहितो आमलोककेँ बादशाह, राजा, शामन्त सभके जय-जयकार करब बाध्यता रहैत छल ।

 

तेहनावस्थामे नारी अस्मिताके रक्षाक लेल चतुर लोक समुदाय समाज युक्ति निकाललक एवं भोग लिप्सालेल आनन्द उठाब चाहल राजा शामन्त सहितके अधिकारीगणके नारीसभ सम्बन्ध बनाबस’ पहिने भाय बना लैत छल आ ओकर पुजा करैत हातमे प्रतिकात्मक सूत एक प्रकारके डोरी बान्हि दैत छल एवं अपन अस्मिताके रक्षाक भार उठाबके सपथ खुवा लैत छल ।

 

कतेक नारी अपनाके कुरुप देखाब लेल अङ्गमे गोदना गोदबा लैत छल । एक प्रकारस’ गोदना प्रथा सेहो मुगलेकालस’ चलनमे आएल मानल जाइत छै । सभ मुलशासक तेहने छल ओ बात नइ मुदा शासनी सञ्जाल तेहन बुनल छल जे सहजे प्रशोधित नइ होब सकल किछु नइ किछु पहुनका असर घर कएने रहल ।

 

राजा रजौटमे सन्हियाएल लोक कामुक होए, जिद्दीयाह होए वा मुर्ख छल होएत । मुदा, अपन वचन पर बहुतो अड़ल रहैत छल । कहलबात पर अड़ल रहब, देलवचन पालन करब अपन कत्र्तब्य बुझैत छल । जाहि कत्र्तव्यके पालन करब हेतु हातमे बान्हल सूत स्मरण दियादैत छल ।

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अइतरहे बावरके उतराधिकारी हुँमायु, हुँमायुके उतराधिकारी अकबर सहितके १५२६-१८५७ धैर मुगल शासनकालमे नारी अस्मिताके सुरक्षा युक्तिपूर्वक तत्कालीन समाजक किछु बुझनिक लोकव्दारा भेल छल । तेकरे फलस्वरुप भैया-भायबीचके सिनेहक प्रतिक डोरी-राखी बान्हिक अपन इज्जत-अश्मतकेँ लुटब डर-भय जिनकास’ छल तिनकेस’ रक्षाक भार बहन करब कराएब काज होब लागल ।

 

वर्तमान समयमे राखीपर्वके रुपमे, रक्षा बन्धनके रुपमे प्रचलित प्रथा विकसित भेल छै एवं मान्य संस्कृतिके महत्वपूणर् अङ्ग बनल छै । भारत-नेपालबीचके सम्बन्ध खुजल सीमाना आइयो छै । तहिया त’ आओर विशाल नेपाल छल । बहुतराश भूभाग नेपालके अधिन छल ।

 

दूनुदेशके सांस्कृतिक परम्परा एकआपसमे बहुतहद्दधैर मीलैत जुलैत छै । दूनुदेशबीचके नागरीस्तर पर रक्त सम्बन्ध छै तैँ प्रथा, प्रचलन संस्कार ब्यवहार सेहो सहजे एकदेशस’ दोसर देश जाइत आबैत घुलैत मीलैत रहल छै ।

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