कत’ हेराएल ओ संस्कार ‘गड़ीमे चैढ़गेल, कहलक-सेताराम !’

२०७७ माघ १८, आईतवार १६:५१
सीमाञ्चल समदिया

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उपेन्द्रभगत नागवंशी,
सीमाञ्चल समदिया, जनकपुरधाम-१८गते, माघ । हमरसबहक सामाजिक व्यवस्था अपनत्ववादके छै । गैरके सेहो अप्पन बना लेल जाइत छै । मीत-संगी-दोस बनाएब आ ओकर सुखःदुःखमे संग पुरब ! तेहन आत्मीय संस्कारिक सम्बन्ध होइत छै । ई मिथिलाक रीति-थिति छै । लोकमानसमे रसल बसल अप्पन खास तरहक बिशेषता छै ।

मिथिलाक अइ विशेषताकेँ आब किछु उच्चका, धन उगाहिकर्ता मानस्किताक लोक अइतरहक मीतव्यतिताकेँ समाप्त करएमे लाइग गेल छै । जेठ-छोटक लेहाज, बृद्ध-बृद्धा, सन्त-महात्मा, गृहस्त-सन्यासीकेँ मान देब, आदर करब सम्मान पाएब ओहो परम्परा मोलजोलहा भए गेल छै । आइ एकटा बस आ ओहिमे सवार भक’ जाए चाहबाला बृद्ध महात्माकेँ खेरहा देखक बसुधैव कुटुम्बकम मूलमर्मस’ हम्मर सबहक समाजक लोक आब कोना मूँह मोइर रहल छै ओ अनुभूति भेल आ दृश्य देखक बड मोन कचोट भेल ।

‘‘ आनेदिन जकाँ हम साइकिलस’ जारहल छलीए । जनकपुरधामस’ महेन्द्रनगर दिस जाएबाला बस सपहीस’ आगु राजदेवीथान तर यात्री बाहक बस बिलमल । चारि-पाँच गोटे पहिनेस’ प्रतिक्षारत् लोक बसमे एक-एकक सवार भेल । ओहि क्रममे एकटा साइठर-सत्तर वर्ष जतेक उमेरगर समान्य दाढ़ीबाला साधुक भेषमे गेरुवा बस्त्र धारन कएने हातमे एकटा ननटुनमा करचीके छड़ी आ स्टीकके ‘कमण्डल’ लेने छल । सभकेँ बसबाला चढ़दैत छल आ ओ बूढ़ाबाबा आगुमे छल ओकरा पाछु कदैत छल….थम्मः..थम्मः…. कैह-कैहक !

बसकेँ गेटलगकेँ पाइपबाला किल्ली धयने बुढ़ाबाबा ठाढ़ छलाह । सभ चैढ़गेलापर बस कन्टेक्टर बाजल चलुचलु गूरुजी…बस ससर लागल । ई बेचारा बुढ़ाबाबाकेँ नइ चढ़ाब चाहैत छल । तैयो ओ बसके किल्ली धयने बसेसंगे अपनो संगे दौड़ रहल छल । तब कन्टेक्टर बाजल…पैसा निकाल पहिने… बुढ़ाबाबा हँफाइत बाजल-‘हौ जी ! मग्नीमे जएबो.., पैसा दैछियो कि..लान ! बस ससैर रहल छल ओहि क्रममे बुढ़ा बाबाकेँ डेन ध’क’ उपर तनलक । गेट पर खाड’ भेला पर बस स्थीर भेल ।

बूढ़ाबाबा बाजल-‘अगेस’ ठाढ़ छी, हमरा चढ़ किएक नै दै छला हो !’ कनेक तमसाइत बाजल । कन्टेक्टर कहलक -‘लाब-लाब पहिने पैसा निकाल’ ! बुढ़ा बाबा बाजल-‘मंगनीमे जएबौ, मंगनीए लजएबहो…।’ बजबा बेसी त’ उतैरजा दोसर बसस’ अबिहा । कन्टेक्टर फेर डेन धयलक । बेचारा बुढ़ाबाबा पहिनहीस’ हातमे टाका धयनही छल,ओ कन्टेक्टरकेँ हातमे दलेक ।

.. कन्टेकर अपन स्वाभाव अनुकूल बजैत रहल ‘तोरा सनसन बाबासभ गड़ीमे चैढ़गेल आ तब कहलक-सेताराम !… बस मंगनीमे नइ चलै हय !’ रकम लैत बुढ़ा बाबाके कहलक जा उपर जा..! जाउ बढ़एने… बस कन्टेक्टर बस चालककेँ संकेत करैत बाजल । बस गतिमान भगेल ।

रविदिन बेरियामे २.३० बजे समय छल । ई प्रसंग होइत काल । बस नम्बर ना ३ ख ८२०४ छल । ई खेरहा देखक हम चकित छली । केहन संस्कार विकसित भरहल छै । केहन संस्कृति पनैप रहल छै । साधु-बाबाकेँ भेषमे रहल गृहस्त आश्रमक लोक-बाबा भाड़ा रकम नइ देत अइ अनुमान पर बसमे चढ़हि नइ देब गलत बात लागल ।

पाँचो आँगूर बराबर नइ होइत छै, ककरो कपार पर लीखल नइ रहैत छै । ई फक्कर छै, ई रग्गर छै ; रकम नइ देत । हँ, नितदिनकेँ कर्मस’ अनुमान करब बेजाय नइ मुदा सबारीगाड़ी यात्रीकेँ सुगमता, सहुलियत आ सहयोगकेँ लेल सञ्चालन कएल जाइत छै । ई बोध बस हँकबैया, खलासी, कन्टेक्टर सभकेँ हुअ चाही जे आवश्यक छै । कहुँ ओ साधुबाबा ओहनावस्थामे खैस परित, किछु भजइतैक तखन ? ओकर जिम्मेवार के ?

अहुना जेष्ठ नागरिक, ओहुमे साधु-सन्तकेँ सम्मानो भावस’ मंगनीय लैइए गेला पर कि फरक पैड़तैक । पचास सय टाका आम्द कम होतै सेहे नइ ! बसमे यात्रा कएला पर निर्धारित किराया-भाड़ा चुकता करब ओ करतव्य निमाहब सचेत नागरिककेँ धर्म हुअक चाही ।

साधु भेषमे जादू चलबबाला केओ टाका नइ द’क’ गेल होएत, ओहि अनुभवकेँ आधार पर दोसरो साधु-सन्त-बाबा एहने करत ओ बिनु बुझने, बसमे सवारे नइ हुअ देब अइमे सुधार सम्बन्धित सभकेँ करब तेरक बेसी दरकार छै । अइ तरहेँ सार्वजनिक बैइजति सेहो एक लेखे ओहि बाबा संग भेल हम मानैत छी जे खेदजनक छै ।

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